What Is IP Address ? Difference Between IPv4 Vs IPv6 – In Hindi

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हम सभी लोगों जहा पर रहते है वहा का एक Address होता है वैसे ही Computer जो Internet से जुड़ा रहता है उसका एक Unique Address होता है. जिसे हम IP ADDRESS ( आईपी एड्रेस ) कहते है. IP address का पूरा नाम इन्टरनेट प्रोटोकॉल एड्रेस ( Internet Protocol Address ) है.

IP Address के द्वारा हम किसी भी Computer को आसानी से Identify कर पाते है और ये Computers जो कि Internet से जुड़े रहते है वो Host कहलाते है. आसान भाषा में कहे आप जिस Computer से Internet चलाते हो उसका एक Unique Number Generate होता है उसको हम IP Address कहते है.

आईपी एड्रेस ( IP ADDRESS ) 32 Bit Numeric Address होता है. IP Address चार अंकों वाला होता है जो 0 से लेकर 255 तक होते हैं. EX.,128.143.137.144 यह एक IP Address है. आपको भी अपना IP Address चेक करना चाहते हो तो आप Google पे जाके my ip address लिखके सर्च करोगे तो आप को अपना IP Address देखने को मिल जाएगा.

 

 

IP Address ( आईपी एड्रेस ) दो प्रकार के होते है :

1) Static IP Address :

ये Address जो कभी Change नही होते है और हमेशा एक ही Number यानि वो IP Number कभी Change नहीं होता है उसको Static IP Address कहते हैं.

 

 

2) Dynamic IP Address :

ये Address हमेशा बदलते रहते हैं ये Address Temporary होते है. जब भी कोई Computer या Device इंटरनेट से Access करता है तब उसे नया IP Address मिलता है. जैसे अगर आप अपने ब्राउज़र को बंध करके फिरसे चालू करोगे तब उसका और पुराने ब्राउज़र का IP Address Change हो जायेगा.

ये तो हमने जाना IP Address के बारे मे और अब हम जानेंगे आखिर ये IPv4 Vs IPv6 क्या है और उनके बीच में क्या अंतर है.

 

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सब से पहले जानते है IPv4 क्या है ?

 

 

IPv4 का पूरा नाम Internet Protocol Version 4 है. यह Internet Protocol का चौथा Version है. जिसका प्रयोग Packet Switched Layer नेटवर्क्स Ethernet में किया जाता है. IPv4 एक Connection Less Protocol ( कनेक्शन-लेस प्रोटोकॉल ) है जिसका प्रयोग Packet Switch Network ( पैकेट स्विच नेटवर्क ) में किया जाता है.

IPv4 बेस्ट एफर्ट डिलीवरी मॉडल ( Best Effort Delivery Model ) के आधार पर काम करता है जिसमे ना तो डिलीवरी की कोई गारंटी होती है और ना ही सही क्रम में पैकेट्स के पहुँचने की. इसमें डुप्लीकेट डिलीवरी की सम्भावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता.

IPv4 32 Bit यानी कि 4 बाइट एड्रेसिंग ( Byte Addressing ) का प्रयोग करता है जो कि 232 Address देते हैं. IPv4 के Address को डॉट-दशमलव नोटेशन में लिखा जाता है जिसमे एड्रेस के कुल चार ओक्टेट होते हैं. इन्हें अलग-अलग दशमलव में लिखा जाता है और पीरियड के द्वारा अलग किया जाता है. Ex., 162.128.1.9.

अब जानते है IPv6 क्या है ?

 

 

IPv6 को इन्टरनेट इंजीनियरिंग टास्क फोर्श ( Internet Engineering Task Force ) द्वारा IPv4 के Exhaustion के समस्या के कारण उसकी जगह लेने के लिए विकसित किया गया था.

यह एक 128 Bits का Address Space है जिसके पास 2^128 Address Space है जो कि IPv4 से बहुत ही ज्यादा है. IPv6 में हम कोलन-हेक्सा रिप्रजेंटेशन ( Colon-hexa Representation ) का प्रयोग करते हैं. इसमें कुल 8 समूह होते हैं और हर एक 2 Byte के होते हैं.

 

आखिर क्यों IPv6 है IPv4 से Best & Secure :

 

 

IPv6 का पूरा नाम Internet Protocol Version 6 है. यह IPv4 का Latest Version है. इसमें बेहतर और Advanced Features है. IPv6 का Header IPv4 के हेडर ( Header ) से केवल दोगुना ही बड़ा है जबकि इसका Address उस से चार गुना बड़ा है. IPv4 6 बिट के DSCP (Difference Service Code Point ) और 2 बिट के ECN ( Explicit Congestion Notification ) का प्रयोग कर के सर्विस की गुणवत्ता देता है. लेकिन इसका प्रयोग तभी किया जा सकता है जब एंड टू एंड Devices इसका समर्थन करें. इसका मतलब ये हुआ कि सोर्स, डेस्टिनेशन और नेटवर्क सब इसे Support करने चाहिए. वहीं IPv6 में ट्रैफिक क्लास और फ्लो लेवल का प्रयोग कर के नेटवर्क के अंदर राऊटर को ये बताया जाता है कि पैकेट को कैसे अच्छी तरह प्रोसेस कर के Rout करना है.

 

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IPv4 को आजकल भी बहुत से Devices में प्रयोग किया जाता है. परन्तु आजकल के dDevices IPv4 तथा IPv6 दोनों को Support करते है.

IPv4 ऑपरेशन के लिए केवल 40 बिट देते हैं वहीं IPv6 में आप्शन इतने बड़े हो सकते हैं जितना कि पैकेट का साइज. इस तरह आपने जाना कि IPv4 और IPv6 कैसे एक-दूसरे से अलग हैं और दोनों के बीच क्या-क्या अंतर है.

 

Different Between IPv4 Vs IPv6 :

 

 

IPv4 :

 

 

  • IPv4 की शुरुआत 1981 में हुई थी.
  • IPv4 मोबाइल नेटवर्क के लिए थोडा कम अनुकूल है.
  • IPv4 में 32 Bits लम्बाई ( Length ) का Address होता है.
  • IPv4 के Address में बाइनरी संख्या होती है जिसे डेसीमल ( Decimal ) में प्रदर्शित किया जाता है.
  • IPv4 में पैकेट फ्लो ( Packet Flow ) की पहचान उपलब्ध नही है.
  • IPv4 Manual और DHCP एड्रेस कॉन्फ़िगरेशन ( Address Configuration ) को Support करता है.
  • IPv4 में एंड टू एंड कनेक्शन ( End to End Connection ) प्राप्त नही किया जा सकता.
  • IPv4 4.29 x 109 Address Generate कर सकता है.
  • IPv4 का Security Features सुरक्षा एप्लीकेशन पर निर्भर करता है.
  • IPv4 का फ्रेगमेंटेशन ( Fragmentation ) सेंडर और फोर्वार्डिंग राऊटर ( Forwarding Router ) दोनों ही कर सकते हैं.
  • IPv4 में मैसेज ट्रांसमिशन ब्राडकास्टिंग ( Broadcasting ) के जरिये होता है.
  • IPv4 को एन्क्रिप्शन ( Encryption ) और ऑथेंटिकेशन ( Authentication ) नही दिया गया है.
  • इसमें Fragmentation Sender और Forwarding Routers दोनों के द्वारा की जाती है.
  • इसमें Header Field की संख्या 12 है.

IPv6 :

 

 

  • IPv6 की शुरुआत 1999 में हुई थी.
  • इसमें Header Field की संख्या 8 है.
  • इसमें Fragmentation केवल Sender के द्वारा की जाती है
  • यह मोबाइल नेटवर्क के लिए ज्यादा अनुकूल है.
  • IPv6 ऑटो-कॉन्फ़िगरेशन ( Auto Configuration ) और रिनम्बरिंग ( Renumbering ) का समर्थन करता है.
  • IPv6 में एंड टू एंड कनेक्शन ( End to End Connection ) मिल जाता है.
  • IPv6 बहुत ही ज्यादा Address Generate करता है.
  • IPv6 में सिक्यूरिटी फीचर के हिसाब से IPSEC इनबिल्ट ( Inbuilt ) है.
  • IPv6 की एड्रेस लेंथ 128 Bits ( 16 Byte ) की होती है.
  • IPv6 में पैकेट फ्लो की पहचान उपलब्ध है.
  • IPv6 में मल्टीकास्टिंग ( Multicasting ) और एनीकास्टिंग ( Encasting ) है.
  • IPv6 में एन्क्रिप्शन ( Encryption ) और ऑथेंटिकेशन ( Authentication ) दिया गया है.

Conclusion :

देखने जाए तो ये जानने के बाद हमें ये पता चलता है की IPv4 और IPv6 दोनों ही बेहतर है. पर आज की Technology के हिसाब से देखे तो IPv6 थोड़ा ज्यादा बहेतर है.

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